"पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुअराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा सर उठाओ तो कोई बात बने"
कहते हैं जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं देवता बसते हैं।
यह हमारे भारतीय संस्कारों के मूल में है। स्त्री शांति और शक्ति दोनों का प्रतीक है इसीलिए हमने हमारे देश और जन्मभूमि को भारत माता माना है। भारत मां जिसने अपनी कोख से कई स्त्री रत्नों को जन्म दिया। जिन्होंने हमारे देश का नाम रोशन किया।
न जाने कितने प्राचीन समय से स्त्री इस पुस्र्षसत्तात्मक संसार का एक हिस्सा रही है, किन्तु धीरे धीरे निश्चित तौर पर उसकी भूमिका बदल गयी, पुस्र्ष के अधीन रहने की जगह उसने अपनी स्वतन्त्र सत्ता बना ली।
आज उसने हर क्षेत्र और जीवन के हर स्तर पर अपने लिये एक जगह बना ली है। । आज स्त्री समाज की आत्मशक्ति है। इसी शक्ति के माध्यम से समाज का भविष्य सुनहरा होता है।
इतिहास इसका साक्षी रहा है। हमारे इतिहास में नक्षत्रों की तरह चमकती एक नहीं कई वीरांगनाएं हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास को नयी दिशा दी है।
आज अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम उन भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों और का सम्मान करते हैं, जिसकी वजह से भारत की लाखों स्त्रियों के जीवनस्तर में सुधार हुआ है।
अपने उददेश्यों के प्रति उनके इस समर्पण, प्रतिबद्वता और उनके पराक्रम को तथा इस पाकृतिक व सामाजिक तौर पर पुस्र्षसत्तात्मक समाज में उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोने के उनके साहस को आज हम नमन करते हैं।
हमारे देश की भूमि उर्वरा है वह ऐसे कन्या रत्नों को जन्म देती ही रहेगी। लेकिन इसके लिये हमें लिंगभेद और कन्याभ्रूण की हत्या को रोकना होगा।
गृहणी : घर संवारने वाली महिला द होम मेकर
एक समय था जब भारतीय महिला सुबह से लेकर रात तक घर का ढर्रा चलाने में संर्घष किया करती थी, खाना पकाना, बर्तन - कपड़े धोना, संतानों को जन्म देना और पालना। किन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी हैं, आज स्त्री महज एक गृहणी नहीं आज वह घर संवारने सहेजने वाली जागरूक महिला है। वह पति की सहचरी है। वह घर की समस्त ज़िम्मेदारियों को गरिमा के साथ वहन करती है। न केवल घरेलू ज़िम्मेदारियां बल्कि वह बाहर के काम भी बखूबी करती है। वह वाहन चलाती है, बच्चों का स्कूल, बैंक का काम, सामाजिक काम सभी का निर्वाह अपने क्षमता के परे जाकर भी करती है।
स्त्री की एक प्रमुख विशेषता है जो पुस्र्ष में कम मिलती है, वह एक ही समय पर कामकाजी महिला और घर का कमाऊ सदस्य होने के साथ साथ माँ, पत्नी, बहू होने की भूमिका नटिनी की तरह कसी रस्सी पर चल कर बखूबी निभा जाती है।
हालांकि बहत कुछ हम पा चुके हैं, बहत सारी उपलब्धियां हमारे हाथों में हैं किन्तु अभी हमें मीलों आगे जाना है। आज भी हमारे ग्रामीण इलाकों की महिलाएं अपने अस्तित्व की स्वतन्त्रता से नावाकिफ हैं। कन्या भ्रूण व बच्चियों की हत्या आज भी हमारे समाज में व्याप्त है।
आज पिछड़ी हुई और गरीब स्त्रियों के लिए हमें एकत्रित होकर संर्घष करना होगा। आज हमें यह वचन लेना चाहिये कि हम ज़रूरतमंद स्त्रियों को पढ़ाएं और किसी भी स्तर पर उनके लिए सहायक सिद्ध हों या उन्हें जागरूक बनने के लिए प्रेरित करें। ताकि वे अपना जीवन स्वास्थ रहकर, आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण तरीके से जी सकें। स्त्री की जागस्र्कता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इस देश के विकास के लिये प्रत्येक महिला का जागस्र्क होना अति आवश्यक है। आओ हम सब मिल कर नारी सशक्तिकरण दिवस की सफलता में योगदान का हाथ बढ़ाएं।
Saturday, March 6, 2010
हमें महिला दिवस मनाने क़ा अधिकार बिल्कुल नहीं है
हमें महिला दिवस मनाने क़ा अधिकार बिल्कुल नहीं है
जहाँ नारी का सम्मान होता है वहॉ देवता बसते हैं। शायद इसीलिये देवता हमसे रूठ गयें हैं और हम भृष्टता की खाई में गिरते जा रहें हैं। आजकल टीवी और अनेकों पत्र- पत्रिकाओं मे अंतर्राष्ट्रीय महिला- दिवस की धूम मची हुई है। कहीं सक्षात्कार लिये जा रहेन हैं तो कहीं तस्वीरें और व्यक्तव्य छापे जा रहें हैं तो कहीं महिलाओं क सम्मान किया जा रहा है। क़ौन हैं ये महिलायें? क्या आप इन्हें इस स्थिति मे लायें हैं?
नहीं ------ ! ये वे महिलायें नहीं हैं जो अपने दम पर सम्मानित हुईं हैं। आज जो औरतें अपने पैरों पर खडीं हैं उनमें से अधिकॉश आर्थिक मजबूरी के कारन घर से बाहर निकली हैं। किसी मे प्रतिभा थी तो किसी में कुछ बनने कि इच्छा। बुद्धिहीन समाज नारी को कमजोर मानता है, लेकिन नारी में इतनी शक्ति होती है कि स्यंव को पहचान कर बिन किसी सहारे के, बाधाओं को दूर करती हुई अपनी मंजिल पर पहुँच जाती हैं। कुछ लोग विशेष रूप से पुरुषवर्ग, नारी की हर कामयाबी का सेहरा अपने सिर पर बॉधने लगता है। आज लगभग 75% महिलायें पुरुषों के कारण ही कामयाब हैं। ये आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पुरुष के दिये विष को उसने अमृत समझ के पिया है कुछ प्रतिवाद् करती है और उनके अहम् को चोट पहुँचाती है। ये चोट ही औरत मे कुछ करके दिखाने का अह्सास जगाती है और यहीं से नारी की स्यंव-सिद्ध यात्रा शुरु होती है। पर इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि महिलाओं को ऊँचा उठाने के लिये पुरुषों का अत्याचार जरुरी है।
इस यात्रा में कुछ महिलायें लक्ष्य तक पहुँच जाती हैं, कुछ रास्ते की चकाचोंध और मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में शॉर्ट-कट अपना लेती हैं और भटक जातीं हैं। इन्हें बदनामी और गुमनामी का जीवन भोगना पड़ता है।
कुछ महिलायें समाज के सामने कमजोर पड़ जातीं हैं जिन्हें जबर्दस्ती पीछे धकेल दिया जाता है। ना चाह्ते हुये भी सब कुछ सहन करने की मजबूरी इन्हें असहाय और पीड़ित बनाया देती है। कुछ न कर पाने क दुख और अत्याचारों की चरम सीमा इन्हें विक्षिप्त कर देती है, तब ये महिलायें घर से बाहर कर दी जातीं हैं, और दर-दर की ठोंकरें खाती सड़कों पर भटकतीं हैं। इस पागलपन कि स्थिति में भी पुरुष प्रधान समाज द्वारा उनपर दया नहीं बल्कि शोषण ही किया जाता है।
दुनिया से संघर्ष करते हुये और अपने को बचाते हुये जो महिलायें समाज मे स्वयं को स्थपित कर सकीं उन्हें महिला-दिवस पर सम्मानित करने से क्या हमारा कर्तव्य पूरा हो गया? क्या हम महिला-दिवस के अवसर पर सिर्फ एक दिन के लिये भी उनपर होने वाले अत्याचारों, बलात्कारों और जानी- अंजानी यातनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।
नहीं ना! जब तक हम नारी का सम्मान करना नहीं सीखेंगें तब तक न हमें कोई सम्मान लेने का अधिकार है न ही देने का और न ही महिला दिवस मनाने का।
जहाँ नारी का सम्मान होता है वहॉ देवता बसते हैं। शायद इसीलिये देवता हमसे रूठ गयें हैं और हम भृष्टता की खाई में गिरते जा रहें हैं। आजकल टीवी और अनेकों पत्र- पत्रिकाओं मे अंतर्राष्ट्रीय महिला- दिवस की धूम मची हुई है। कहीं सक्षात्कार लिये जा रहेन हैं तो कहीं तस्वीरें और व्यक्तव्य छापे जा रहें हैं तो कहीं महिलाओं क सम्मान किया जा रहा है। क़ौन हैं ये महिलायें? क्या आप इन्हें इस स्थिति मे लायें हैं?
नहीं ------ ! ये वे महिलायें नहीं हैं जो अपने दम पर सम्मानित हुईं हैं। आज जो औरतें अपने पैरों पर खडीं हैं उनमें से अधिकॉश आर्थिक मजबूरी के कारन घर से बाहर निकली हैं। किसी मे प्रतिभा थी तो किसी में कुछ बनने कि इच्छा। बुद्धिहीन समाज नारी को कमजोर मानता है, लेकिन नारी में इतनी शक्ति होती है कि स्यंव को पहचान कर बिन किसी सहारे के, बाधाओं को दूर करती हुई अपनी मंजिल पर पहुँच जाती हैं। कुछ लोग विशेष रूप से पुरुषवर्ग, नारी की हर कामयाबी का सेहरा अपने सिर पर बॉधने लगता है। आज लगभग 75% महिलायें पुरुषों के कारण ही कामयाब हैं। ये आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पुरुष के दिये विष को उसने अमृत समझ के पिया है कुछ प्रतिवाद् करती है और उनके अहम् को चोट पहुँचाती है। ये चोट ही औरत मे कुछ करके दिखाने का अह्सास जगाती है और यहीं से नारी की स्यंव-सिद्ध यात्रा शुरु होती है। पर इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि महिलाओं को ऊँचा उठाने के लिये पुरुषों का अत्याचार जरुरी है।
इस यात्रा में कुछ महिलायें लक्ष्य तक पहुँच जाती हैं, कुछ रास्ते की चकाचोंध और मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में शॉर्ट-कट अपना लेती हैं और भटक जातीं हैं। इन्हें बदनामी और गुमनामी का जीवन भोगना पड़ता है।
कुछ महिलायें समाज के सामने कमजोर पड़ जातीं हैं जिन्हें जबर्दस्ती पीछे धकेल दिया जाता है। ना चाह्ते हुये भी सब कुछ सहन करने की मजबूरी इन्हें असहाय और पीड़ित बनाया देती है। कुछ न कर पाने क दुख और अत्याचारों की चरम सीमा इन्हें विक्षिप्त कर देती है, तब ये महिलायें घर से बाहर कर दी जातीं हैं, और दर-दर की ठोंकरें खाती सड़कों पर भटकतीं हैं। इस पागलपन कि स्थिति में भी पुरुष प्रधान समाज द्वारा उनपर दया नहीं बल्कि शोषण ही किया जाता है।
दुनिया से संघर्ष करते हुये और अपने को बचाते हुये जो महिलायें समाज मे स्वयं को स्थपित कर सकीं उन्हें महिला-दिवस पर सम्मानित करने से क्या हमारा कर्तव्य पूरा हो गया? क्या हम महिला-दिवस के अवसर पर सिर्फ एक दिन के लिये भी उनपर होने वाले अत्याचारों, बलात्कारों और जानी- अंजानी यातनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।
नहीं ना! जब तक हम नारी का सम्मान करना नहीं सीखेंगें तब तक न हमें कोई सम्मान लेने का अधिकार है न ही देने का और न ही महिला दिवस मनाने का।
नारी
हे नारी…. हे नारी, तू शक्ती है, तू भक्ती है
तू ममता की, साक्षात मूर्ती है।
तुझसे निपजता सारा जीवन, तूझमें विहरता सारा यौवन,
तू वृध्दों के लिए सेवा है, तू हर सुखों की कर्ता है।
हे नारी….
तू प्रकृति की परिभाषा, तू निसर्ग की परछाई,
तू भजन का भक्तिभाव है, तू रणभूमी की स्फूर्ति है।
हे नारी….
तू है छाया, तू है धूप, तू चंडी का रौद्ररूप,
थर्राती तुझसे धरती है, दिगदिगांत में तेरी कीर्ती है।
हे नारी….
तू सीता के मन में समाई, तू राधा के तन में समाई,
साधूसंत जिसे स्वर्ग कहतें है, तू धरती पर वही मुक्ति है।
तू ममता की, साक्षात मूर्ती है।
तुझसे निपजता सारा जीवन, तूझमें विहरता सारा यौवन,
तू वृध्दों के लिए सेवा है, तू हर सुखों की कर्ता है।
हे नारी….
तू प्रकृति की परिभाषा, तू निसर्ग की परछाई,
तू भजन का भक्तिभाव है, तू रणभूमी की स्फूर्ति है।
हे नारी….
तू है छाया, तू है धूप, तू चंडी का रौद्ररूप,
थर्राती तुझसे धरती है, दिगदिगांत में तेरी कीर्ती है।
हे नारी….
तू सीता के मन में समाई, तू राधा के तन में समाई,
साधूसंत जिसे स्वर्ग कहतें है, तू धरती पर वही मुक्ति है।
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