हमें महिला दिवस मनाने क़ा अधिकार बिल्कुल नहीं है
जहाँ नारी का सम्मान होता है वहॉ देवता बसते हैं। शायद इसीलिये देवता हमसे रूठ गयें हैं और हम भृष्टता की खाई में गिरते जा रहें हैं। आजकल टीवी और अनेकों पत्र- पत्रिकाओं मे अंतर्राष्ट्रीय महिला- दिवस की धूम मची हुई है। कहीं सक्षात्कार लिये जा रहेन हैं तो कहीं तस्वीरें और व्यक्तव्य छापे जा रहें हैं तो कहीं महिलाओं क सम्मान किया जा रहा है। क़ौन हैं ये महिलायें? क्या आप इन्हें इस स्थिति मे लायें हैं?
नहीं ------ ! ये वे महिलायें नहीं हैं जो अपने दम पर सम्मानित हुईं हैं। आज जो औरतें अपने पैरों पर खडीं हैं उनमें से अधिकॉश आर्थिक मजबूरी के कारन घर से बाहर निकली हैं। किसी मे प्रतिभा थी तो किसी में कुछ बनने कि इच्छा। बुद्धिहीन समाज नारी को कमजोर मानता है, लेकिन नारी में इतनी शक्ति होती है कि स्यंव को पहचान कर बिन किसी सहारे के, बाधाओं को दूर करती हुई अपनी मंजिल पर पहुँच जाती हैं। कुछ लोग विशेष रूप से पुरुषवर्ग, नारी की हर कामयाबी का सेहरा अपने सिर पर बॉधने लगता है। आज लगभग 75% महिलायें पुरुषों के कारण ही कामयाब हैं। ये आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पुरुष के दिये विष को उसने अमृत समझ के पिया है कुछ प्रतिवाद् करती है और उनके अहम् को चोट पहुँचाती है। ये चोट ही औरत मे कुछ करके दिखाने का अह्सास जगाती है और यहीं से नारी की स्यंव-सिद्ध यात्रा शुरु होती है। पर इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि महिलाओं को ऊँचा उठाने के लिये पुरुषों का अत्याचार जरुरी है।
इस यात्रा में कुछ महिलायें लक्ष्य तक पहुँच जाती हैं, कुछ रास्ते की चकाचोंध और मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में शॉर्ट-कट अपना लेती हैं और भटक जातीं हैं। इन्हें बदनामी और गुमनामी का जीवन भोगना पड़ता है।
कुछ महिलायें समाज के सामने कमजोर पड़ जातीं हैं जिन्हें जबर्दस्ती पीछे धकेल दिया जाता है। ना चाह्ते हुये भी सब कुछ सहन करने की मजबूरी इन्हें असहाय और पीड़ित बनाया देती है। कुछ न कर पाने क दुख और अत्याचारों की चरम सीमा इन्हें विक्षिप्त कर देती है, तब ये महिलायें घर से बाहर कर दी जातीं हैं, और दर-दर की ठोंकरें खाती सड़कों पर भटकतीं हैं। इस पागलपन कि स्थिति में भी पुरुष प्रधान समाज द्वारा उनपर दया नहीं बल्कि शोषण ही किया जाता है।
दुनिया से संघर्ष करते हुये और अपने को बचाते हुये जो महिलायें समाज मे स्वयं को स्थपित कर सकीं उन्हें महिला-दिवस पर सम्मानित करने से क्या हमारा कर्तव्य पूरा हो गया? क्या हम महिला-दिवस के अवसर पर सिर्फ एक दिन के लिये भी उनपर होने वाले अत्याचारों, बलात्कारों और जानी- अंजानी यातनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।
नहीं ना! जब तक हम नारी का सम्मान करना नहीं सीखेंगें तब तक न हमें कोई सम्मान लेने का अधिकार है न ही देने का और न ही महिला दिवस मनाने का।
Saturday, March 6, 2010
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