Saturday, March 6, 2010

महिला दिवस

"पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुअराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा सर उठाओ तो कोई बात बने"
कहते हैं जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं देवता बसते हैं।
यह हमारे भारतीय संस्कारों के मूल में है। स्त्री शांति और शक्ति दोनों का प्रतीक है इसीलिए हमने हमारे देश और जन्मभूमि को भारत माता माना है। भारत मां जिसने अपनी कोख से कई स्त्री रत्नों को जन्म दिया। जिन्होंने हमारे देश का नाम रोशन किया।
न जाने कितने प्राचीन समय से स्त्री इस पुस्र्षसत्तात्मक संसार का एक हिस्सा रही है, किन्तु धीरे धीरे निश्चित तौर पर उसकी भूमिका बदल गयी, पुस्र्ष के अधीन रहने की जगह उसने अपनी स्वतन्त्र सत्ता बना ली।
आज उसने हर क्षेत्र और जीवन के हर स्तर पर अपने लिये एक जगह बना ली है। । आज स्त्री समाज की आत्मशक्ति है। इसी शक्ति के माध्यम से समाज का भविष्य सुनहरा होता है।
इतिहास इसका साक्षी रहा है। हमारे इतिहास में नक्षत्रों की तरह चमकती एक नहीं कई वीरांगनाएं हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास को नयी दिशा दी है।
आज अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम उन भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों और का सम्मान करते हैं, जिसकी वजह से भारत की लाखों स्त्रियों के जीवनस्तर में सुधार हुआ है।
अपने उददेश्यों के प्रति उनके इस समर्पण, प्रतिबद्वता और उनके पराक्रम को तथा इस पाकृतिक व सामाजिक तौर पर पुस्र्षसत्तात्मक समाज में उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोने के उनके साहस को आज हम नमन करते हैं।
हमारे देश की भूमि उर्वरा है वह ऐसे कन्या रत्नों को जन्म देती ही रहेगी। लेकिन इसके लिये हमें लिंगभेद और कन्याभ्रूण की हत्या को रोकना होगा।
गृहणी : घर संवारने वाली महिला द होम मेकर
एक समय था जब भारतीय महिला सुबह से लेकर रात तक घर का ढर्रा चलाने में संर्घष किया करती थी, खाना पकाना, बर्तन - कपड़े धोना, संतानों को जन्म देना और पालना। किन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी हैं, आज स्त्री महज एक गृहणी नहीं आज वह घर संवारने सहेजने वाली जागरूक महिला है। वह पति की सहचरी है। वह घर की समस्त ज़िम्मेदारियों को गरिमा के साथ वहन करती है। न केवल घरेलू ज़िम्मेदारियां बल्कि वह बाहर के काम भी बखूबी करती है। वह वाहन चलाती है, बच्चों का स्कूल, बैंक का काम, सामाजिक काम सभी का निर्वाह अपने क्षमता के परे जाकर भी करती है।
स्त्री की एक प्रमुख विशेषता है जो पुस्र्ष में कम मिलती है, वह एक ही समय पर कामकाजी महिला और घर का कमाऊ सदस्य होने के साथ साथ माँ, पत्नी, बहू होने की भूमिका नटिनी की तरह कसी रस्सी पर चल कर बखूबी निभा जाती है।
हालांकि बहत कुछ हम पा चुके हैं, बहत सारी उपलब्धियां हमारे हाथों में हैं किन्तु अभी हमें मीलों आगे जाना है। आज भी हमारे ग्रामीण इलाकों की महिलाएं अपने अस्तित्व की स्वतन्त्रता से नावाकिफ हैं। कन्या भ्रूण व बच्चियों की हत्या आज भी हमारे समाज में व्याप्त है।
आज पिछड़ी हुई और गरीब स्त्रियों के लिए हमें एकत्रित होकर संर्घष करना होगा। आज हमें यह वचन लेना चाहिये कि हम ज़रूरतमंद स्त्रियों को पढ़ाएं और किसी भी स्तर पर उनके लिए सहायक सिद्ध हों या उन्हें जागरूक बनने के लिए प्रेरित करें। ताकि वे अपना जीवन स्वास्थ रहकर, आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण तरीके से जी सकें। स्त्री की जागस्र्कता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इस देश के विकास के लिये प्रत्येक महिला का जागस्र्क होना अति आवश्यक है। आओ हम सब मिल कर नारी सशक्तिकरण दिवस की सफलता में योगदान का हाथ बढ़ाएं।

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